Sunday, 19 February 2012

कर महसूस तेरे स्पर्श की महकश अदाओं को,
मेरे लब थरथराते हैं
अब तेरे हुस्न का किस्सा ,हमें गुलशन सुनाते हैं!

खिल उठती हैं गुमनाम फिजायें भी ,जब वो मुस्कुराते हैं
ठहर जाती है जिंदगी पल भर,जब वो नज़रें झुकाते हैं
अब तेरे हुस्न का किस्सा ,हमें गुलशन सुनाते हैं!

तेरे नैनों की शरारत को,हम भूल न पाते हैं
अब तेरे हुस्न का किस्सा ,हमें गुलशन सुनाते हैं!

सुना है हर किस्सा मुहब्बत का ,बड़े ही चाव से हमने
हर किस्से में तेरा ही ज़िक्र,अब हम सबको सुनाते हैं!
अब तेरे हुस्न का किस्सा ,हमें गुलशन सुनाते हैं!

समा तुम रूह में जाओ,मेरी पुरजोर कोशिश है
छुपा लूँ तुमको साये में ,बस थोड़ी सी बंदिश है
जो दूर हो बंदिश,फिर किया दर्दे-रंजिश है
पिरोकर गीतों में तुमको,हर पल गुनगुनाते हैं
अब तेरे हुस्न का किस्सा ,हमें गुलशन सुनाते हैं!

ये बातें हैं सारी,जो तुमसे कहनी हैं
बनी जो तेरे अश्को की माला,मैने हरदम ही पहनी है
दूर गये जब तुम हर पल याद आए हो
खुशियों से भरी वादी ,साथ में लाये हो

कुछ बातें हैं ऐसी ,जो हम कह नहीं पाते हैं
लौट के आ जाओ,अब हम रह नहीं पाते हैं
अब तेरे हुस्न का किस्सा,हमें ये गुलशन सुनाते हैं!






Saturday, 18 February 2012


यूँ  तो  वक़्त  गुजरता  है  बड़ी  तेज़ी  से ,
थम  जाये  वक़्त  का  पहिया  तब  बात और हो!  .

यूँ तो करते हैं इबादत मंदिर, मस्जिद में जाकर सभी ,
कुबूल  हो  इबादत  हर  किसी  की  तब  बात  और  हो!

यूँ तो करते हैं मुहब्बत दुनिया में सभी किसी न किसी से
मायना समझ जाएँ मुहब्बत का तब बात और हो!

यूँ तो ढूँढ़ते हैं हर रोज़ अपने ही अक्स को आईने में सभी,
मिले किसी की नज़रों में अपना अक्स तब बात और हो !..

यूँ तो हैं बहुत से इस दुनिया में बेघर अभी ,
मिल जाये आशियाना हर किसी को तब बात और हो!

यूँ तो हैं रस्ते इस दुनिया में बहुत ,
मिले हर रस्ते पे मंजिल तब बात और हो !.

यूँ तो शरीक होते हैं अपने और पराये,ज़नाज़े में अक्सर ,
पराये हो जाए अपने तब बात और हो !.

यूँ तो होती है ठंडक सूरज की तपिश में कभी -कभी
शीतल हो जाये मन सभी का तब बात और हो !.

यूँ तो मिलती है  नजाकत इकाद की नज़रों में कभी कभी ,
मिले हर नज़र में नजाकत तब बात और हो .

यूँ तो होते हैं कई रंग जिंदगी में ,
हर रंग उतर जाये जिंदगी में तब बात और हो .

यूँ तो होती है महफ़िल रंगीन,खुशनुमा मोकों पे कभी कभी,
हर शाम हो जाए रंगीन,तब बात और हो .

यूँ तो लिख लेते हैं अल्फाजों को कागज़ पर हम भी कभी कभी ,
लिख जाये कुछ नया तब बात और हो................
अन्जाने में खता हुई ,
जीवन भर की ये सता हुई!

                               फूलों से दमकता गुलशन था
                                  हर अंग ज़हां का रोशन था

बस खुशियों की ही वादी थी
ग़मों की होती यहाँ पे शादी थी

                            अब तूफानों का ये आंगन है
                             घनघोर घटा सा साजन है

 काले सायाओं का घेरा है
अरसों से नहीं हुआ ,यहाँ कोई सवेरा है
बस अंधियारों का पहरा है

                               काली रातों के दामन में ,
                             छुप गया कोई इक चेहरा है!

मेरा गुलशन अब बेज़ार हुआ
दुनिया को मेरा ये सार हुआ!