न कर भरोसा इन गैर -बफाओं पर,
इनकी तो फितरत है हमें, खाक में मिलाने की....
कर गुज़र अपने खुआबों को पूरा यूँ ही,
न जाने फिर कब खुदा ,हमें इस काबिल समझे..........
खुद खुदा का ही काबू नहीं अपनी ही खुदाई पर ,
वरना यूँ ही नहीं होते ,हर रोज़ कत्ले-आम दुनिया में................
No comments:
Post a Comment